
हरिद्वार: हरिद्वार वन प्रभाग के देवपुरा बीट क्षेत्र में करीब 55 वर्षीय एक दांत वाले जंगली हाथी की उपचार के दौरान मौत हो गई। निर्माणाधीन रिंग रोड के नजदीक जंगल में हाथी का शव मिलने के बाद वन विभाग में हड़कंप मच गया। यह हाथी पिछले करीब दो सप्ताह से जगजीतपुर और आसपास के आबादी वाले क्षेत्रों में लगातार आवाजाही कर रहा था। कई बार वह फेंसिंग तोड़कर आबादी और कृषि भूमि तक पहुंच गया था। मानव-हाथी संघर्ष की आशंका को देखते हुए वन विभाग की हाथी मॉनिटरिंग टास्क फोर्स उसकी गतिविधियों पर लगातार नजर रख रही थी। हाथी को रेडियो कॉलर लगाने के लिए चिह्नित किया गया था। इसी सिलसिले में 6 नवंबर को भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII), WWF और वन विभाग के विशेषज्ञों तथा वन्यजीव पशु चिकित्सकों की संयुक्त टीम ने उसे डार्ट किया। इसके बाद हाथी की तबीयत बिगड़ गई। टीम ने उसे बचाने के लिए तत्काल उपचार शुरू किया, लेकिन तमाम प्रयासों के बावजूद उसकी जान नहीं बचाई जा सकी।
दो सप्ताह से आबादी के आसपास कर रहा था आवाजाही
वन विभाग के अनुसार, देवपुरा बीट और आसपास के क्षेत्रों में नियमित निगरानी के दौरान इस एक दांत वाले हाथी की गतिविधियां हरिद्वार शहर और मानव बस्तियों के बेहद करीब पाई गई थीं। हाथी लगातार आबादी वाले क्षेत्रों और कृषि भूमि में विचरण कर रहा था। कई बार उसके हरिद्वार शहर की ओर आने के वीडियो भी सोशल मीडिया पर सामने आए थे। हाथी के बार-बार आबादी में पहुंचने से मानव-हाथी संघर्ष की आशंका बढ़ रही थी। इसी को देखते हुए वन विभाग ने उसकी गतिविधियों पर विशेष निगरानी शुरू की थी। आगामी कुंभ मेला-2027 और शहर के आसपास हाथियों की बढ़ती आवाजाही को ध्यान में रखते हुए रेडियो कॉलर लगाने के लिए हाथियों को चिह्नित करने की प्रक्रिया भी चल रही थी।
रेडियो कॉलर लगाने के लिए गठित हुई थी विशेष टास्क फोर्स
वन विभाग ने आबादी वाले क्षेत्रों में पहुंचने और लोगों के लिए खतरा पैदा करने की आशंका वाले हाथियों की पहचान कर उनकी गतिविधियों पर नजर रखने के लिए विशेष टास्क फोर्स गठित की थी। इसमें वन विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों के साथ भारतीय वन्यजीव संस्थान के वैज्ञानिक, WWF के विशेषज्ञ और पशु चिकित्सा अधिकारी शामिल हैं। इस टीम ने अब तक 18 हाथियों को चिह्नित किया था। इनमें से छह हाथियों को रेडियो कॉलर लगाने की योजना के तहत टीम हरिद्वार पहुंची थी। रेडियो कॉलर की मदद से हाथियों की लोकेशन और आवाजाही पर नजर रखी जा सकती है, जिससे उनके आबादी की ओर आने की स्थिति में समय रहते सतर्कता बरती जा सके। इसी अभियान के तहत पिछले दो सप्ताह से आबादी के आसपास लगातार दिखाई दे रहे एक दांत वाले हाथी को भी रेडियो कॉलर लगाने के लिए चुना गया था।
डार्ट करने के बाद बिगड़ी हाथी की तबीयत
वन विभाग के अनुसार, 6 नवंबर को भारतीय वन्यजीव संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिकों, WWF विशेषज्ञों, अनुभवी वन्यजीव पशु चिकित्सकों और वन विभाग की संयुक्त टीम ने हाथी को विशेषज्ञों की निगरानी में डार्ट किया। इसके बाद उसे लगातार वैज्ञानिकों और पशु चिकित्सकों की निगरानी में रखा गया। हालांकि, उपचार और निगरानी के दौरान हाथी की स्थिति अचानक बिगड़ गई। स्थिति गंभीर होते ही टीम ने उसे तत्काल ऑक्सीजन, सीपीआर, रिवर्सल औषधि, आईवी फ्लूड और अन्य आपातकालीन पशु चिकित्सा उपचार उपलब्ध कराया। विशेषज्ञों ने हाथी को बचाने के लिए हरसंभव प्रयास किए, लेकिन उसकी हालत में सुधार नहीं हुआ और अंततः पशु चिकित्सकों ने उसे मृत घोषित कर दिया।
पोस्टमार्टम में सामने आई हृदय संबंधी गंभीर बीमारी
हाथी की मौत के बाद स्वतंत्र पशु चिकित्सक विशेषज्ञों के दल ने उसका पोस्टमार्टम किया। इसमें हाथी की उम्र करीब 55 वर्ष आंकी गई। जांच के दौरान उसके हृदय में गंभीर विकार पाए गए। पशु चिकित्सकों के अनुसार, हाथी के हृदय में मायोकार्डियल फाइब्रोसिस और कार्डियोमायोपैथी जैसे बदलाव मौजूद थे। प्राथमिक चिकित्सकीय निष्कर्षों के अनुसार, अत्यधिक उम्र से जुड़ी हृदय संबंधी समस्याएं हाथी की मौत का संभावित कारण बनीं। बताया गया कि बाहरी तौर पर हाथी की स्थिति सामान्य दिखाई दे रही थी, लेकिन आंतरिक जांच में हृदय संबंधी गंभीर बीमारी सामने आई। इस तरह के विकार का केवल बाहरी निरीक्षण से पता लगाना संभव नहीं था। वन विभाग का कहना है कि डार्ट किए जाने के दौरान पैदा हुए शारीरिक तनाव को हाथी का कमजोर हृदय सहन नहीं कर पाया हो सकता है। हालांकि, मौत के वास्तविक कारणों की अंतिम पुष्टि विस्तृत पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही हो सकेगी।
DFO स्वप्निल अनिरुद्ध ने क्या कहा?
हरिद्वार के डीएफओ स्वप्निल अनिरुद्ध के अनुसार, रेडियो कॉलरिंग के लिए गठित विशेष टास्क फोर्स हाथियों को चिह्नित कर उनकी गतिविधियों की लगातार निगरानी कर रही थी। इसी क्रम में इस हाथी पर भी नजर रखी जा रही थी। हाथी के बीमार होने की जानकारी मिलने के बाद विशेषज्ञों की टीम ने उसका उपचार शुरू किया, लेकिन उसे बचाया नहीं जा सका। डीएफओ ने बताया कि हाथी को बचाने के लिए वन विभाग, भारतीय वन्यजीव संस्थान, WWF और पशु चिकित्सकों की संयुक्त टीम ने हरसंभव प्रयास किए। प्राथमिक जांच में पोस्टमार्टम के दौरान सामने आए हृदय संबंधी विकार को मौत का संभावित कारण माना जा रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि मौत की वास्तविक वजह विस्तृत पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही सामने आएगी।
मानव-हाथी संघर्ष रोकने के लिए चल रहा था निगरानी अभियान
हरिद्वार और आसपास के क्षेत्रों में हाथियों की आवाजाही लंबे समय से वन विभाग के लिए चुनौती बनी हुई है। जंगल से सटे आबादी वाले क्षेत्रों और कृषि भूमि में हाथियों के पहुंचने से लोगों और वन्यजीवों के बीच संघर्ष की आशंका बनी रहती है। कई बार हाथियों के फेंसिंग तोड़कर बस्तियों में पहुंचने की घटनाएं भी सामने आती रही हैं। इसी चुनौती से निपटने के लिए वन विभाग रेडियो कॉलरिंग और निगरानी अभियान चला रहा है, ताकि संवेदनशील हाथियों की गतिविधियों का पता लगाकर समय रहते जरूरी कदम उठाए जा सकें। लेकिन इस अभियान के दौरान करीब 55 वर्षीय हाथी की मौत ने वन्यजीव संरक्षण और रेडियो कॉलरिंग की प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल भी खड़े कर दिए हैं। अब विस्तृत पोस्टमार्टम रिपोर्ट से मौत के कारणों को लेकर स्थिति और स्पष्ट होने की उम्मीद है।




