
देहरादून: उत्तराखंड में सरकारी जमीनों और संपत्तियों को लीज पर देने तथा निजी हाथों में सौंपने के मुद्दे पर कांग्रेस ने धामी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी के 13 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल ने राज्यपाल से मुलाकात कर विस्तृत ज्ञापन सौंपा। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि प्रदेश की बेशकीमती सरकारी जमीनों और ऐतिहासिक संपत्तियों को औने-पौने दामों पर निजी कंपनियों को सौंपा जा रहा है। पार्टी ने इन फैसलों को निरस्त करने, संपत्तियों को उनके मूल विभागों को वापस लौटाने और पूरे मामले की स्वतंत्र जांच कराने की मांग की है। प्रतिनिधिमंडल ने सरकारी जमीनों के हस्तांतरण और लीज प्रक्रिया के अलावा कैबिनेट मंत्री गणेश जोशी के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति के मामले में न्यायालय के निर्देशों का पालन करने, कोरोना काल में सहकारिता विभाग में हुई नियुक्तियों की जांच कराने तथा एमबीबीएस दाखिलों में कथित फर्जी दस्तावेजों के इस्तेमाल के मामलों की भी जांच कराने की मांग उठाई।
सरकारी संपत्तियों के फैसले मुख्यमंत्री के स्तर पर केंद्रित करने का आरोप
राज्यपाल को सौंपे गए ज्ञापन में कांग्रेस प्रतिनिधिमंडल ने संविधान के अनुच्छेद 154 और 166 का उल्लेख करते हुए कहा कि राज्य की कार्यपालिका शक्ति राज्यपाल में निहित है और प्रदेश सरकार की कार्यवाही राज्यपाल के नाम से जारी होती है। कांग्रेस का कहना है कि सरकारी जमीनों और ऐतिहासिक धरोहरों को निजी हाथों में सौंपने से संबंधित शासनादेश भी राज्यपाल की स्वीकृति के नाम पर जारी किए गए हैं। ऐसे में राज्य की इन संपत्तियों के संवैधानिक संरक्षण और उनके हस्तांतरण की प्रक्रिया की समीक्षा आवश्यक है। ज्ञापन में आरोप लगाया गया कि 20 दिसंबर 2022 के कैबिनेट निर्णय से सभी विभागों की सरकारी भूमि के संबंध में अंतिम निर्णय लेने का अधिकार मुख्यमंत्री के स्तर पर केंद्रित कर दिया गया। कांग्रेस ने इसे संविधान के अनुच्छेद 164(2) में वर्णित मंत्रिपरिषद के सामूहिक उत्तरदायित्व और राज्य सरकार की कार्य नियमावली के प्रावधानों के विपरीत बताया। पार्टी का तर्क है कि बहुविभागीय मामलों में संबंधित विभागों और प्रभारी मंत्रियों की भूमिका तथा आवश्यक परामर्श की प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए था।
जॉर्ज एवरेस्ट एस्टेट की लीज पर उठाए सवाल
कांग्रेस ने मसूरी स्थित जॉर्ज एवरेस्ट एस्टेट की 142 एकड़ भूमि को निजी कंपनी को 15 वर्षों के लिए लीज पर दिए जाने के मामले को प्रमुखता से उठाया। ज्ञापन में दावा किया गया कि हजारों करोड़ रुपये के बाजार मूल्य वाली इस भूमि और राष्ट्रीय धरोहर को लगभग एक करोड़ रुपये सालाना किराये पर दिया गया। प्रतिनिधिमंडल ने आरोप लगाया कि प्रकाशित कंपनी अभिलेखों के अनुसार टेंडर प्रक्रिया में शामिल तीनों बोलीदाता कंपनियां एक ही व्यक्ति से जुड़ी हुई थीं। कांग्रेस ने इस आधार पर निविदा प्रक्रिया की पारदर्शिता और प्रतिस्पर्धा पर सवाल खड़े किए हैं। पार्टी ने कहा कि जॉर्ज एवरेस्ट एस्टेट को लीज पर देने की प्रक्रिया में राज्य सरकार की कार्य नियमावली और तत्कालीन उत्तराखंड अधिप्राप्ति नियमावली के प्रावधानों का पालन नहीं किए जाने की आशंका है। कांग्रेस ने इस पूरे प्रकरण की वैधानिकता और प्रशासनिक प्रक्रिया की स्वतंत्र समीक्षा कराने की मांग की है। साथ ही जॉर्ज एवरेस्ट एस्टेट से संबंधित सभी पत्रावलियां तलब करने, लीज निरस्त करने और उच्च न्यायालय की निगरानी में जांच कराने का अनुरोध किया है।
यूआईआईडीबी अधिनियम के प्रावधानों के उल्लंघन का आरोप
ज्ञापन में उत्तराखंड निवेश एवं अवसंरचना विकास बोर्ड (यूआईआईडीबी) अधिनियम, 2023 का भी उल्लेख किया गया है। कांग्रेस का कहना है कि अधिनियम की धारा 28(3)(घ) के तहत प्रत्येक परियोजना के लिए सरकार और संबंधित विभाग का अनुमोदन आवश्यक है, जबकि धारा 28(4) के अनुसार संपत्तियों का मुद्रीकरण राज्य सरकार के निर्देश पर किया जाना चाहिए। प्रतिनिधिमंडल ने आरोप लगाया कि बाद में मूल विभाग की सहमति से जुड़ी शर्त को यह कहकर हटा दिया गया कि मुख्यमंत्री का अनुमोदन प्राप्त है। कांग्रेस के अनुसार, सरकारी जमीनों और संपत्तियों को लीज पर देने के लिए यूआईआईडीबी को हस्तांतरित करने वाली कई पत्रावलियों में संबंधित विभागीय मंत्री की सहमति दर्ज नहीं है। ज्ञापन में जनवरी 2025 और दिसंबर 2025 में जारी शासनादेशों का हवाला देते हुए कहा गया कि पटवाडांगर, नगऊ, धनौल्टी और मगरा सहित कई स्थानों की जमीन यूआईआईडीबी को हस्तांतरित करने की प्रक्रिया मुख्यमंत्री के अनुमोदन के आधार पर आगे बढ़ाई गई। इसके अलावा आईडीपीएल ऋषिकेश, डाकपत्थर, रामगढ़, एचएमटी रानीबाग, पाटकोट-मरचूला, सलेमपुर महमूद और माजरी ग्रांट की संपत्तियों का भी उल्लेख किया गया है। कांग्रेस का आरोप है कि इन संपत्तियों को हस्तांतरित करने के निर्णय यूआईआईडीबी अधिनियम के तहत बोर्ड के स्तर पर लिए जाने चाहिए थे, लेकिन प्रक्रिया में मुख्यमंत्री के स्तर पर ही निर्णय किए गए। पार्टी ने यह भी सवाल उठाया कि जमीनों के हस्तांतरण में अनुशंसा समिति की संस्तुतियों का आधार लिया गया, जबकि उसके अनुसार अधिनियम में ऐसी समिति का स्पष्ट उल्लेख नहीं है।
राजस्व अभिलेख और भूमि की पैमाइश के बिना हस्तांतरण का दावा
कांग्रेस प्रतिनिधिमंडल ने पटवाडांगर और डाकपत्थर की जमीनों के हस्तांतरण को लेकर राजस्व अभिलेखों और मालिकाना हक से जुड़े सवाल भी उठाए। ज्ञापन के मुताबिक, 15 जनवरी 2025 को पटवाडांगर की भूमि यूआईआईडीबी को हस्तांतरित करने संबंधी शासनादेश में इसे कृषि विभाग की जमीन बताया गया था। कांग्रेस ने दावा किया कि राजस्व विभाग ने 4 सितंबर 2025 को अधिसूचना जारी कर गांव का सर्वेक्षण शुरू किया था। वहीं, राजस्व परिषद ने 9 सितंबर 2025 के पत्र में कथित तौर पर उल्लेख किया कि करीब 108 एकड़ भूमि वन विभाग और राजस्व विभाग के अभिलेखों में दर्ज नहीं है। इसी तरह डाकपत्थर की भूमि को बंदोबस्त की प्रक्रिया पूरी होने और खसरा संख्या निर्धारित होने से पहले हस्तांतरित किए जाने का आरोप लगाया गया। कांग्रेस ने कहा कि स्पष्ट राजस्व अभिलेखों और मालिकाना हक के बिना जमीनों का हस्तांतरण भू-राजस्व से जुड़े कानूनों के अनुपालन पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
ऐतिहासिक भवनों और वन भूमि को लेकर भी जताई चिंता
ज्ञापन में कांग्रेस ने कहा कि जमीन और संपत्तियों के हस्तांतरण से जुड़े शासनादेशों में यह शर्त रखी गई है कि धार्मिक या ऐतिहासिक महत्व की इमारतों वाली भूमि हस्तांतरित नहीं की जाएगी और संपत्तियों का उपयोग केवल अनुमोदित परियोजनाओं के लिए होगा। पार्टी का आरोप है कि इन शर्तों के बावजूद कई महत्वपूर्ण संपत्तियों को सूची में शामिल किया गया है। इस संबंध में हरिद्वार स्थित हर की पैड़ी के अलकनंदा होटल और ऋषिकेश सहित 25 निरीक्षण भवनों का उल्लेख किया गया। कांग्रेस ने कहा कि इनमें वर्ष 1866 से 1928 के बीच निर्मित ब्रिटिशकालीन भवन भी शामिल हैं, जिनका ऐतिहासिक महत्व है। इसके अलावा रामगढ़ स्थित राजकीय उद्यान की आठ हेक्टेयर भूमि में से लगभग चार हेक्टेयर क्षेत्र में घना वन होने का दावा करते हुए कांग्रेस ने उसके गैर-वन उपयोग पर आपत्ति जताई। पार्टी का कहना है कि वन संरक्षण कानून के प्रावधानों को ध्यान में रखे बिना ऐसी भूमि का उपयोग बदलना उचित नहीं है।
पटवाडांगर की 13.64 एकड़ भूमि की 90 साल की लीज पर सवाल
कांग्रेस ने पटवाडांगर की 13.64 एकड़ भूमि को 90 वर्षों के लिए लीज पर देने की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए। ज्ञापन में अनुशंसा समिति की 29 अगस्त 2025 की बैठक के कार्यवृत्त का हवाला देते हुए कहा गया कि भूमि के मूल्य और राजस्व साझेदारी पर चर्चा अगली बैठक में किए जाने की बात थी। इसके बावजूद इस भूमि को 37.80 करोड़ रुपये के रिजर्व प्राइस पर टेंडर कर दिया गया। प्रतिनिधिमंडल ने यह भी आरोप लगाया कि नैनीताल शहर के सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट को होटल परियोजना के लिए वहां से हटाने के निर्देश दिए गए। कांग्रेस ने ज्ञापन में दावा किया कि मौजूदा बाजार भाव के अनुसार करीब 40 सरकारी संपत्तियों का कुल मूल्य कम से कम एक लाख करोड़ रुपये है और ये संपत्तियां प्रदेश के 13 में से 12 जिलों में स्थित हैं।
कांग्रेस ने चार प्रमुख मांगें राज्यपाल के सामने रखीं
सरकारी जमीनों और संपत्तियों के हस्तांतरण से जुड़े मामलों में कांग्रेस ने राज्यपाल से चार प्रमुख मांगें की हैं—
- जॉर्ज एवरेस्ट एस्टेट प्रकरण: इससे संबंधित सभी पत्रावलियां मंगाई जाएं, लीज निरस्त की जाए और पूरे मामले की उच्च न्यायालय की निगरानी में स्वतंत्र जांच कराई जाए।
- कैबिनेट निर्णय की समीक्षा: 20 दिसंबर 2022 के कैबिनेट निर्णय के तहत मुख्यमंत्री द्वारा अकेले लिए गए सभी निर्णयों और उनसे संबंधित शासनादेशों को निरस्त किया जाए।
- तीन टेंडर निरस्त करने की मांग: पटवाडांगर (टेंडर संख्या 97862/2026), अलकनंदा होटल हरिद्वार (टेंडर संख्या 99265/2026) और ऋषिकेश निरीक्षण भवन (टेंडर संख्या 99301/2026) से संबंधित यूआईआईडीबी के तीनों टेंडर तत्काल निरस्त किए जाएं।
- मूल विभागों को संपत्तियां लौटाने की मांग: यूआईआईडीबी और सिडकुल को हस्तांतरित की गई सभी जमीनें और संपत्तियां उनके मूल विभागों को वापस की जाएं। साथ ही लोक निर्माण विभाग के निरीक्षण भवनों को पीपीपी मोड में देने की प्रक्रिया रोकी जाए।
गणेश जोशी की आय से अधिक संपत्ति के मामले में कार्रवाई की मांग
सरकारी जमीनों के मुद्दे के साथ कांग्रेस ने कैबिनेट मंत्री गणेश जोशी के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति के मामले को भी राज्यपाल के समक्ष उठाया। ज्ञापन में कहा गया कि इस मामले में न्यायालय की ओर से मुकदमा दर्ज करने की अनुमति से संबंधित निर्देश दिए जाने के बावजूद राज्य सरकार ने अब तक आवश्यक अनुमति प्रदान नहीं की है। कांग्रेस ने सवाल उठाया कि जब किसी जनप्रतिनिधि के खिलाफ भ्रष्टाचार से संबंधित मामले में न्यायालय की ओर से निर्देश दिए गए हैं, तो कार्रवाई में देरी क्यों हो रही है। प्रतिनिधिमंडल ने इस मामले में तत्काल वैधानिक अनुमति देने और निष्पक्ष जांच सुनिश्चित कराने की मांग की।
कोरोना काल में सहकारिता विभाग की भर्तियों की जांच की मांग
कांग्रेस ने कोरोना महामारी के दौरान सहकारिता विभाग में हुई नियुक्तियों को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए। ज्ञापन में कहा गया कि महामारी के समय जब देश संकट से गुजर रहा था, तब प्रदेश के सहकारिता मंत्री धन सिंह रावत के कार्यकाल में राज्य से बाहर प्रतियोगी परीक्षा आयोजित कर विभाग में भर्तियां की गईं। प्रतिनिधिमंडल ने आरोप लगाया कि इन नियुक्तियों में अभ्यर्थियों से कथित तौर पर 20-20 लाख रुपये लेकर नौकरी दिए जाने की शिकायतें सामने आई थीं। कांग्रेस ने इसे युवाओं के भविष्य और भर्ती व्यवस्था की पारदर्शिता से जुड़ा गंभीर मामला बताते हुए किसी स्वतंत्र और निष्पक्ष उच्चस्तरीय जांच एजेंसी से जांच कराने की मांग की। पार्टी ने कहा कि जांच के आधार पर दोषियों की पहचान कर उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए।
एमबीबीएस दाखिलों में कथित फर्जी दस्तावेजों की जांच की मांग
कांग्रेस ने प्रदेश में एमबीबीएस की कुछ सीटों पर कथित फर्जी दस्तावेजों के आधार पर दाखिले किए जाने का मामला भी उठाया। ज्ञापन में कहा गया कि चिकित्सा शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र में इस तरह की अनियमितताएं योग्य विद्यार्थियों के अधिकारों को प्रभावित कर सकती हैं और चिकित्सा शिक्षा व्यवस्था की पारदर्शिता पर सवाल खड़े करती हैं। प्रतिनिधिमंडल ने इस मामले की समयबद्ध और निष्पक्ष जांच कराने, दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई करने तथा अनुचित तरीके से प्राप्त दाखिलों के संबंध में नियमानुसार निर्णय लेने की मांग की।
10 दिन का अल्टीमेटम, हाईकोर्ट जाने की चेतावनी
कांग्रेस प्रतिनिधिमंडल ने राज्यपाल को दिए ज्ञापन में कहा कि सरकारी संपत्तियों के हस्तांतरण, भर्ती प्रक्रिया और भ्रष्टाचार से जुड़े इन मामलों में कार्रवाई में देरी से आम जनता के बीच सवाल खड़े हो रहे हैं। पार्टी ने आरोप लगाया कि प्रभावशाली लोगों से जुड़े मामलों में कार्रवाई नहीं हो रही है, जबकि आम नागरिकों और युवाओं को न्याय पाने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। प्रतिनिधिमंडल ने मांग की कि ज्ञापन प्राप्त होने के 10 दिनों के भीतर सरकारी जमीनों और संपत्तियों के हस्तांतरण से जुड़े विवादित निर्णय निरस्त किए जाएं तथा संपत्तियों को उनके मूल विभागों को वापस लौटाने की कार्रवाई शुरू की जाए। कांग्रेस ने चेतावनी दी कि यदि निर्धारित अवधि में सरकार ने इन मांगों पर कार्रवाई नहीं की, तो राज्य की संपत्तियों के संरक्षण के लिए पार्टी उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाएगी।
कांग्रेस के प्रतिनिधिमंडल में ये नेता रहे शामिल
राज्यपाल से मुलाकात करने वाले प्रतिनिधिमंडल में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गणेश गोदियाल, नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य, पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत, चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष प्रीतम सिंह, चुनाव प्रबंधन समिति के अध्यक्ष डॉ. हरक सिंह रावत, विधायक मदन बिष्ट और फुरकान अहमद, पूर्व विधायक मनोज रावत, प्रदेश उपाध्यक्ष सीपी सिंह और राजीव महर्षि, प्रदेश महामंत्री राजेंद्र शाह, महिला कांग्रेस अध्यक्ष ज्योति रौतेला, सुरेंद्र सिंह रांगड़ और राजेश चमोली सहित अन्य नेता शामिल रहे। कांग्रेस ने राज्यपाल से पूरे मामले में हस्तक्षेप कर सरकारी जमीनों और संपत्तियों के हस्तांतरण की प्रक्रिया की समीक्षा कराने तथा उठाए गए अन्य मामलों में निष्पक्ष जांच और आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित कराने का अनुरोध किया।




