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गोबर से बना रहीं आकर्षक उत्पाद, रामनगर की नीतिका और बेटे देव की अनूठी पहल

रामनगर: नैनीताल जिले के रामनगर में मां-बेटे की एक जोड़ी इन दिनों अपनी रचनात्मक पहल और स्वरोजगार के प्रयासों को लेकर चर्चा में है। जहां आमतौर पर गोबर को बेकार समझकर फेंक दिया जाता है, वहीं रामनगर की नीतिका इसी गोबर को आकर्षक और उपयोगी उत्पादों में बदल रही हैं। पर्यावरण संरक्षण, पारंपरिक कला और स्थानीय संसाधनों के बेहतर उपयोग को जोड़कर उन्होंने स्वरोजगार का एक अलग रास्ता तैयार किया है। इस काम में उनका 12वीं कक्षा में पढ़ने वाला बेटा देव भी पूरे उत्साह के साथ सहयोग कर रहा है। नीतिका और देव गोबर से मां लक्ष्मी के चरण, भगवान गणेश की प्रतिमाएं, शिव परिवार, ऐपण कलाकृतियां, मुकुट, राष्ट्रीय ध्वज और कई तरह की सजावटी वस्तुएं तैयार करते हैं। उनकी इस पहल की खासियत यह है कि इसमें पारंपरिक कला को नए स्वरूप में प्रस्तुत करने के साथ ग्रामीण परिवारों और महिलाओं के लिए रोजगार के अवसर भी तैयार किए जा रहे हैं।

‘मैं छुं पहाड़ी नीतिका’ नाम से चला रहीं अपना ब्रांड

नीतिका ने बताया कि उनके ब्रांड का नाम ‘मैं छुं पहाड़ी नीतिका’ है। इसी नाम से वह अपने उत्पाद तैयार करती हैं और विभिन्न क्षेत्रों में प्रशिक्षण कार्यक्रम भी संचालित करती हैं। रामनगर के घास मंडी स्थित पालिका बाजार में उनकी दुकान और पार्लर है, जहां उनके हाथों से तैयार किए गए गोबर, जूट और ऐपण कला से जुड़े उत्पाद देखे जा सकते हैं। उनका उद्देश्य स्थानीय संसाधनों का उपयोग कर ऐसी वस्तुएं तैयार करना है, जिन्हें लोग घरों में सजावट और धार्मिक अवसरों पर इस्तेमाल कर सकें। गोबर से बनी गणेश प्रतिमाएं, लक्ष्मी के चरण, गौ माता के चित्र और अन्य कलाकृतियां उनकी प्रमुख उत्पादों में शामिल हैं। इसके अलावा वह जूट से आकर्षक बैग और रोजमर्रा में उपयोग होने वाली दूसरी वस्तुएं भी बनाती हैं।

गोबर जुटाना थी सबसे बड़ी चुनौती, ग्रामीणों को भी जोड़ा

नीतिका के लिए इस काम की शुरुआत में सबसे बड़ी चुनौती शहर में रहकर पर्याप्त मात्रा में गोबर जुटाना था। इसके समाधान के लिए उन्होंने अपनी दुकान पर आने वाले ग्रामीण ग्राहकों से संपर्क किया। उन्होंने ग्रामीणों को गोबर को फेंकने के बजाय सुखाकर सुरक्षित रखने के लिए प्रेरित किया और इसके बदले उचित कीमत देने की बात कही। इस पहल से दोनों पक्षों को लाभ मिलने लगा। ग्रामीण परिवारों को गोबर से अतिरिक्त आमदनी का अवसर मिला, वहीं नीतिका को अपने उत्पाद तैयार करने के लिए जरूरी कच्चा माल उपलब्ध होने लगा। इस तरह उन्होंने अपने छोटे से व्यवसाय को स्थानीय लोगों के सहयोग से आगे बढ़ाया।नीतिका का यह प्रयास पहाड़ की देशी गायों के संरक्षण और उनके महत्व को बढ़ावा देने से भी जुड़ा है। वह गोबर को केवल पारंपरिक उपयोग तक सीमित रखने के बजाय उससे नए और आकर्षक उत्पाद तैयार कर रही हैं, ताकि स्थानीय संसाधनों का आर्थिक रूप से भी उपयोग किया जा सके।

गोबर से राष्ट्रीय ध्वज से लेकर गणेश प्रतिमाओं तक तैयार कर रहीं उत्पाद

नीतिका की रचनात्मकता का अंदाजा उनके उत्पादों की विविधता से लगाया जा सकता है। वह गोबर से राष्ट्रीय ध्वज, भगवान गणेश की प्रतिमाएं, मां लक्ष्मी के चरण, गौ माता के चित्र, शिव परिवार और कई तरह की सजावटी वस्तुएं बनाती हैं। इसके साथ ही ऐपण कला के पारंपरिक स्वरूप को भी अपने उत्पादों में शामिल करती हैं। उनकी एक खास विशेषता यह भी है कि उत्पाद तैयार करने के लिए जरूरी कई सांचे यानी मोल्ड वह खुद बनाती हैं। इससे उन्हें बाजार से महंगे सांचे खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती और अपनी जरूरत के अनुसार नए डिजाइन तैयार करने की सुविधा मिलती है। वह लगातार अलग-अलग आकार और डिजाइन के उत्पाद बनाने का प्रयास करती हैं।

परिवार के साथ महिलाएं भी जुड़ीं, रोजगार के मिल रहे अवसर

इस काम को आगे बढ़ाने में नीतिका के परिवार का भी सहयोग मिल रहा है। उनके बच्चे और भतीजियां उत्पाद तैयार करने में हाथ बंटाते हैं। इसके अलावा कुछ अन्य महिलाएं भी इस पहल से जुड़ी हुई हैं। इससे उन्हें काम सीखने और आमदनी का अवसर मिल रहा है। नीतिका की कोशिश है कि पारंपरिक कला और स्थानीय संसाधनों पर आधारित इस काम को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाया जाए। उनके अनुसार, यदि महिलाएं अपने हुनर को पहचानकर छोटे स्तर पर भी काम शुरू करें, तो वे स्वरोजगार की दिशा में आगे बढ़ सकती हैं।

ऐपण कला से लेकर मशरूम उत्पादन तक देती हैं प्रशिक्षण

नीतिका केवल गोबर और जूट के उत्पाद बनाने तक सीमित नहीं हैं। वह ऐपण कला, ब्यूटीशियन और मशरूम उत्पादन सहित कई क्षेत्रों में प्रशिक्षण कार्यक्रम भी चलाती हैं। इन प्रशिक्षणों के माध्यम से वह लोगों को अलग-अलग कौशल सिखाने और उन्हें स्वरोजगार के लिए तैयार करने का प्रयास कर रही हैं। उनका मानना है कि स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों और पारंपरिक हुनर का सही उपयोग किया जाए, तो रोजगार के नए रास्ते खुल सकते हैं। इसी सोच के साथ वह अपने ब्रांड के माध्यम से उत्पाद निर्माण और प्रशिक्षण, दोनों गतिविधियों को आगे बढ़ा रही हैं।

मां से सीखा हुनर, पढ़ाई के साथ काम में सहयोग कर रहा बेटा देव

नीतिका के बेटे देव ने बताया कि वह 12वीं कक्षा में पढ़ता है और उसने यह काम अपनी मां से ही सीखा है। पढ़ाई के साथ वह मां के काम में भी सहयोग करता है। देव गोबर से मां लक्ष्मी के चरण, भगवान गणेश की प्रतिमाएं और शिव परिवार सहित कई तरह के उत्पाद तैयार करता है। देव का कहना है कि इस काम से उनके परिवार को रोजगार मिल रहा है और पर्यावरण संरक्षण में भी योगदान देने का अवसर मिल रहा है। मां के साथ काम करते हुए उसने रचनात्मक हुनर सीखा है और अब वह भी उत्पाद तैयार करने में सक्रिय भूमिका निभा रहा है। रामनगर की नीतिका और उनके बेटे देव की यह पहल दिखाती है कि स्थानीय संसाधनों, पारंपरिक कला और परिवार के सहयोग से स्वरोजगार की नई संभावनाएं विकसित की जा सकती हैं। गोबर को उपयोगी उत्पादों में बदलने का उनका प्रयास न केवल एक अलग तरह का व्यवसाय है, बल्कि ग्रामीण परिवारों और महिलाओं को आय से जोड़ने तथा पहाड़ी कला-संस्कृति को आगे बढ़ाने की दिशा में भी एक सराहनीय पहल है।

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