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उत्तराखंड हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: मंडी परिषद की जमीन पर अतिक्रमण वाली PIL खारिज, सेठपुर पंचायत मामले में 9 महीने की समयसीमा

नैनीताल: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने मंडी परिषदों की जमीन पर कथित अतिक्रमण के मामले में दायर जनहित याचिका खारिज कर दी है। वहीं, हरिद्वार जिले की ग्राम पंचायत सेठपुर से जुड़े एक अन्य मामले में अदालत ने चकबंदी अधिकारी को पंचायत के प्रस्ताव की सत्यता की जांच कर कानून के अनुसार कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं। दोनों मामलों में अदालत के आदेश सरकारी भूमि, अतिक्रमण और याचिका दायर करने की प्रक्रिया से जुड़े अहम पहलुओं को सामने लाते हैं।

मंडी परिषद की जमीन पर अतिक्रमण की PIL खारिज

उत्तराखंड हाईकोर्ट में मंडी परिषदों की भूमि पर कथित अवैध कब्जे को लेकर जनहित याचिका संख्या 136/2026, राजेश कुमार बनाम राज्य उत्तराखंड व अन्य, दायर की गई थी। 6 अक्टूबर 2026 को मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई के बाद याचिका खारिज कर दी।सुनवाई के दौरान अदालत ने संबंधित दस्तावेजों का अवलोकन किया। रिकॉर्ड से सामने आया कि उत्तराखंड कृषि उत्पादन मंडी बोर्ड के प्रबंध निदेशक विभिन्न मंडी समितियों के सचिवों से अतिक्रमण के संबंध में जानकारी लेकर मामले की जांच कर रहे हैं। इसके अलावा, 17 फरवरी 2026 के एक पत्र में कृषि उत्पादन मंडी समिति, किच्छा को दुकानदारों द्वारा किए गए अस्थायी अतिक्रमण हटाने के निर्देश जारी किए जाने का उल्लेख भी मिला।

विभागीय जांच जारी होने पर अदालत की टिप्पणी

हाईकोर्ट ने पाया कि संबंधित विभाग अतिक्रमण के मामले में पहले से जांच कर रहा है। साथ ही, जिन लोगों पर कथित अवैध कब्जे के आरोप लगाए गए थे, वे इस याचिका में पक्षकार नहीं थे। इन परिस्थितियों को देखते हुए खंडपीठ ने रिट कार्यवाही में हस्तक्षेप करने की आवश्यकता नहीं समझी और जनहित याचिका खारिज कर दी।

सेठपुर ग्राम पंचायत मामले में चकबंदी अधिकारी को निर्देश

एक अन्य मामले में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने हरिद्वार जिले के लक्सर विकासखंड की ग्राम पंचायत सेठपुर से संबंधित याचिका का निस्तारण किया। वरिष्ठ न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की एकलपीठ ने संबंधित चकबंदी अधिकारी को सबसे पहले यह जांचने का निर्देश दिया कि क्या ग्राम पंचायत के सदस्यों ने ग्राम प्रधान को अदालत में याचिका दायर करने के लिए अधिकृत करने वाला प्रस्ताव वास्तव में पारित किया था। याचिका में ग्राम प्रधान ने आरोप लगाया था कि ग्राम पंचायत की सार्वजनिक भूमि पर अतिक्रमण किया गया है। इस संबंध में 23 जून 2026 को चकबंदी अधिकारी के समक्ष प्रत्यावेदन दिया गया था, लेकिन उस पर निर्णय नहीं लिया गया। याचिका के साथ पंचायत सदस्यों का कथित प्रस्ताव भी संलग्न किया गया था, जिसके आधार पर प्रधान ने अदालत का रुख किया।

नौ महीने के भीतर पूरी करनी होगी कार्रवाई

हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि चकबंदी अधिकारी पहले प्रस्ताव पारित होने की पुष्टि करें। यदि प्रस्ताव वास्तव में पारित हुआ था, तो अधिकारी अतिक्रमण से जुड़े मुद्दे पर विचार कर कानून के अनुसार उचित आदेश पारित करें। अदालत ने यह प्रक्रिया आदेश की प्रमाणित प्रति प्रस्तुत किए जाने की तारीख से नौ महीने के भीतर पूरी करने को कहा है।कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जिन लोगों पर फैसले का असर पड़ने की संभावना है, उन्हें सुनवाई का उचित अवसर दिया जाए। इन दोनों मामलों में हाईकोर्ट के आदेशों का केंद्र अतिक्रमण से जुड़े मामलों में विभागीय कार्रवाई, संबंधित पक्षों को सुनवाई का अवसर और याचिका दायर करने के लिए आवश्यक प्राधिकरण की पुष्टि रहा।

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