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हरिद्वार विकास प्राधिकरण पर सूचना आयोग सख्त, PIO प्रशांत सेमवाल पर ₹10 हजार का जुर्माना

सूचना का अधिकार (RTI) कानून के तहत मांगी गई जानकारी समय पर और सही तरीके से उपलब्ध नहीं कराने के मामले में उत्तराखंड राज्य सूचना आयोग ने हरिद्वार विकास प्राधिकरण (HDA) के लोक सूचना अधिकारी एवं सहायक अभियंता प्रशांत सेमवाल पर 10,000 रुपये का जुर्माना लगाया है। आयोग ने मामले को गंभीरता से लेते हुए प्राधिकरण के उपाध्यक्ष को विभागीय जांच कराने और लापरवाही के लिए जिम्मेदार कर्मचारियों की भूमिका की पड़ताल करने के निर्देश भी दिए हैं।

गायत्री विहार के भू-उपयोग को लेकर उठा विवाद

यह मामला हरिद्वार के भूपतवाला स्थित गायत्री विहार और आसपास की कॉलोनियों से जुड़ा है। आरटीआई क्लब उत्तराखंड के सदस्य एवं हरिद्वार निवासी अजीत सिंह चौहान ने उत्तराखंड हाईकोर्ट में जनहित याचिका (PIL संख्या 30/2021) दाखिल कर आवासीय कॉलोनियों में कथित तौर पर नियमों के विपरीत पार्किंग के बिना बहुमंजिला होटल बनाए जाने का मुद्दा उठाया था। याचिका की सुनवाई के दौरान वर्ष 2024 में हरिद्वार विकास प्राधिकरण ने हाईकोर्ट में हलफनामा दाखिल कर दावा किया था कि मास्टर प्लान 2011 के तहत गायत्री विहार का भू-उपयोग आवासीय से व्यावसायिक हो चुका है। इस दावे के बाद अजीत सिंह चौहान ने सूचना का अधिकार कानून के तहत संबंधित दस्तावेजों और सरकारी रिकॉर्ड की जानकारी मांगी, ताकि भू-उपयोग में कथित बदलाव की प्रक्रिया और उससे जुड़े नियमों की स्थिति स्पष्ट हो सके।

RTI में मांगे गए थे तीन प्रमुख बिंदुओं पर दस्तावेज

अजीत सिंह चौहान ने दूधाधारी चौक से सप्तर्षि पुलिस चौकी के बीच स्थित गायत्री विहार, घनश्याम विहार, जीडी पुरम, उत्तम बस्ती और सप्तम विहार समेत आसपास की कॉलोनियों से संबंधित जानकारी मांगी थी। उनकी ओर से मुख्य रूप से तीन प्रकार के रिकॉर्ड मांगे गए थे:

  • वर्ष 2007 से 2021 के बीच कॉलोनियों का भू-उपयोग व्यावसायिक किए जाने से संबंधित अधिसूचनाओं की प्रतियां।
  • आवासीय भूमि को व्यावसायिक उपयोग में बदलने से जुड़े सरकारी आदेश, सड़क की चौड़ाई और पार्किंग मानकों से संबंधित दस्तावेज।
  • भू-उपयोग परिवर्तन के संबंध में जनता को सूचित करने के लिए समाचार पत्रों में प्रकाशित विज्ञापनों की प्रतियां।

आरोप है कि निर्धारित समयसीमा में स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई। आवेदक के अनुसार, 36 दिन बीतने और प्रथम अपील किए जाने के बाद अतिरिक्त शुल्क की मांग की गई। इसके बाद 29 जुलाई 2025 को भेजे गए जवाब को भी उन्होंने गलत और भ्रामक बताते हुए चुनौती दी।

सूचना आयोग के आदेश के बाद भी नहीं मिला स्पष्ट जवाब

प्राप्त विवरण के अनुसार, अजीत सिंह चौहान ने जवाब से असंतुष्ट होकर राज्य सूचना आयोग में दूसरी अपील दाखिल की। आयोग ने 28 अक्टूबर 2025 को आदेश जारी किया, लेकिन आवेदक का आरोप था कि इसके बाद भी उन्हें पहले जैसी भ्रामक जानकारी दोबारा उपलब्ध कराई गई। बार-बार स्पष्ट जानकारी नहीं मिलने पर उन्होंने आयोग के समक्ष फिर आपत्ति दर्ज कराई। मामले की सुनवाई के दौरान सूचना आयुक्त दलीप सिंह कुंवर ने प्राधिकरण के जवाबों और सूचना उपलब्ध कराने की प्रक्रिया पर सख्त रुख अपनाया।

23 जनवरी 2026 को प्राधिकरण ने दिया लिखित जवाब

मामले में आगे की सुनवाई के दौरान हरिद्वार विकास प्राधिकरण के तत्कालीन सचिव मनीष सिंह 23 जनवरी 2026 को आयोग के समक्ष उपस्थित हुए। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, इस दौरान प्राधिकरण की ओर से संबंधित भू-उपयोग परिवर्तन के दस्तावेजों के संबंध में लिखित जवाब दिया गया। प्राधिकरण ने कथित तौर पर बताया कि गायत्री विहार और आसपास की कॉलोनियों का भू-उपयोग आवासीय से व्यावसायिक किए जाने से संबंधित कोई दस्तावेज या रिकॉर्ड उसके पास उपलब्ध नहीं है। इस जवाब के बाद प्राधिकरण द्वारा हाईकोर्ट में प्रस्तुत हलफनामे में किए गए दावे और RTI के तहत उपलब्ध कराई गई जानकारी के बीच अंतर को लेकर सवाल खड़े हुए। हालांकि, हलफनामे की वैधता या उसमें गलत जानकारी दिए जाने के संबंध में अंतिम निष्कर्ष सक्षम न्यायिक प्रक्रिया और संबंधित अभिलेखों के आधार पर ही निकाला जा सकता है।

प्रशांत सेमवाल पर ₹10 हजार का जुर्माना, विभागीय जांच के निर्देश

राज्य सूचना आयुक्त दलीप सिंह कुंवर ने लोक सूचना अधिकारी प्रशांत सेमवाल को सूचना देने में देरी और भ्रामक जानकारी उपलब्ध कराने के मामले में जिम्मेदार मानते हुए 10,000 रुपये का जुर्माना लगाया। सुनवाई के दौरान अधिकारी ने यह भी कहा था कि RTI आवेदन 7 मई 2025 को कार्यालय में प्राप्त हुआ था, लेकिन उन्हें 13 मई को मिला। आवेदन मिलने में हुई छह दिन की देरी को ध्यान में रखते हुए आयोग ने हरिद्वार विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष को पूरे प्रकरण की विभागीय जांच कराने के निर्देश दिए हैं। जांच के माध्यम से यह पता लगाया जाना है कि सूचना उपलब्ध कराने में हुई देरी और कथित लापरवाही के लिए कौन जिम्मेदार था।

भू-उपयोग और पारदर्शिता पर फिर उठे सवाल

यह मामला केवल RTI के जवाब में हुई देरी तक सीमित नहीं है। इसके केंद्र में गायत्री विहार और आसपास की कॉलोनियों के भू-उपयोग परिवर्तन से संबंधित रिकॉर्ड की उपलब्धता तथा प्राधिकरण की ओर से अदालत में दिए गए दावे भी हैं। अब विभागीय जांच और संबंधित दस्तावेजों की समीक्षा से यह स्पष्ट होने की उम्मीद है कि रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं होने की स्थिति में हाईकोर्ट में भू-उपयोग परिवर्तन के संबंध में क्या आधार प्रस्तुत किया गया था। फिलहाल, राज्य सूचना आयोग की कार्रवाई ने सरकारी विभागों में सूचना के अधिकार के तहत समयबद्ध, स्पष्ट और जवाबदेह प्रक्रिया की आवश्यकता को फिर सामने ला दिया है।

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