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उत्तराखंड में 14 हजार से ज्यादा प्राकृतिक जलस्रोतों की मैपिंग पूरी, जल संरक्षण के लिए बनेगी नई रणनीति

अल्मोड़ा: उत्तराखंड में प्राकृतिक जलस्रोतों के संरक्षण और भविष्य की जल सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल की गई है। राज्य के 14 हजार से अधिक प्राकृतिक जलस्रोतों का सूचीकरण और मैपिंग पूरी कर ली गई है। इस पहल का उद्देश्य पारंपरिक जलस्रोतों की पहचान कर उन्हें संरक्षित करना, उनके पुनर्जीवन के उपाय विकसित करना और हिमालयी क्षेत्रों में पानी की उपलब्धता को बेहतर बनाने के प्रयासों को गति देना है। यह जानकारी गोविंद बल्लभ पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान की 27वीं बैठक में सामने आई। दिल्ली में आयोजित इस बैठक की अध्यक्षता केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने की। बैठक में हिमालयी पर्यावरण की सुरक्षा, जैव विविधता के संरक्षण और पर्वतीय क्षेत्रों में रहने वाले समुदायों के सामाजिक-आर्थिक विकास से जुड़े विषयों पर चर्चा की गई।

14 हजार से अधिक जलस्रोतों का हुआ सूचीकरण

हिमालयी क्षेत्रों में प्राकृतिक जलस्रोत स्थानीय आबादी की पेयजल जरूरतों, कृषि और पारिस्थितिकी के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसे में इनकी पहचान और मैपिंग को जल संरक्षण की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है। संस्थान की ओर से किए गए इस कार्य के तहत 14 हजार से अधिक जलस्रोतों का सूचीकरण किया गया है। इसका उद्देश्य इन स्रोतों से संबंधित जानकारी को व्यवस्थित करना और संरक्षण की योजनाओं को वैज्ञानिक आधार प्रदान करना है। इसके साथ ही जल अभयारण्य पहल के अंतर्गत जलस्रोतों को पुनर्जीवित करने के मॉडल विकसित किए जा रहे हैं। इन प्रयासों से प्राकृतिक जलस्रोतों के संरक्षण और स्थानीय स्तर पर जल उपलब्धता से जुड़ी योजनाओं को आगे बढ़ाने में मदद मिल सकती है।

हिमालयी पर्यावरण संरक्षण पर वैज्ञानिक अनुसंधान का जोर

संस्थान की 27वीं बैठक में हिमालयी क्षेत्र की पर्यावरणीय चुनौतियों और उनके समाधान के लिए विज्ञान आधारित अनुसंधान की भूमिका पर विशेष चर्चा हुई। केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव की अध्यक्षता में हुई बैठक में पर्यावरण संरक्षण के साथ स्थानीय समुदायों की आजीविका और विकास संबंधी जरूरतों को भी महत्व दिया गया। संस्थान के निदेशक डॉ. आईडी भट्ट ने पिछले एक वर्ष के दौरान किए गए प्रमुख कार्यों, शोध परियोजनाओं और तकनीकी नवाचारों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि संस्थान जल सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन, हिमनदों के अध्ययन, जैव विविधता संरक्षण, पर्यटन, आजीविका संवर्धन और आपदा जोखिम कम करने जैसे क्षेत्रों में काम कर रहा है। बैठक में इस बात पर जोर दिया गया कि हिमालयी क्षेत्र की संवेदनशील पारिस्थितिकी को सुरक्षित रखने के लिए अनुसंधान और स्थानीय जरूरतों के बीच बेहतर तालमेल आवश्यक है।

उत्तराखंड समेत तीन राज्यों में आनुवंशिक संसाधनों के संरक्षण की पहल

हिमालयी क्षेत्र में स्थानीय प्रजातियों और आनुवंशिक संसाधनों के संरक्षण के लिए भी प्रयास किए जा रहे हैं। बैठक में जानकारी दी गई कि उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और सिक्किम में स्थानीय आनुवंशिक संसाधनों के संरक्षण के लिए केंद्र स्थापित किए गए हैं। इन केंद्रों के माध्यम से क्षेत्रीय जैव विविधता और स्थानीय संसाधनों के संरक्षण को बढ़ावा देने की दिशा में काम किया जा रहा है। हिमालयी पारिस्थितिकी में स्थानीय वनस्पतियों और जैविक संसाधनों की अहम भूमिका को देखते हुए ऐसे प्रयासों को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

पिरूल से उत्पाद बनाने की तकनीक का हस्तांतरण

बैठक में पर्यावरण संरक्षण के साथ स्थानीय संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल से जुड़े तकनीकी नवाचारों की जानकारी भी साझा की गई। संस्थान ने चीड़ की सूखी पत्तियों यानी पिरूल से मूल्यवर्धित उत्पाद तैयार करने की तकनीक समाज को हस्तांतरित की है। पिरूल का उपयोगी उत्पादों में रूपांतरण स्थानीय स्तर पर रोजगार और आजीविका के नए अवसर पैदा करने में मदद कर सकता है। इसके साथ ही चीड़ की पत्तियों के प्रबंधन को लेकर भी संभावनाएं विकसित हो सकती हैं। संस्थान को उपचारित अपशिष्ट जल पर आधारित हाइड्रोपोनिक तकनीक के लिए पेटेंट मिलने की जानकारी भी बैठक में दी गई। इसके अलावा तीन अन्य पेटेंट प्रक्रियाधीन बताए गए।

हिमालयी गांवों की आजीविका सुधारने पर चर्चा

बैठक में सदस्यों ने हिमालयी गांवों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति बेहतर बनाने के लिए अनुसंधान आधारित विकास कार्यों को मजबूत करने की जरूरत बताई। स्थानीय उत्पादों को पहचान दिलाने, उनके बाजार विस्तार और समुदायों को आर्थिक लाभ पहुंचाने से जुड़े विषय भी चर्चा में शामिल रहे। केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव ने स्थानीय उत्पादों की जीआई टैगिंग, जैव विविधता पंजीकरण, लाभ-साझाकरण और विभिन्न संस्थानों के बीच सहयोग को प्राथमिकता देने पर जोर दिया। इन प्रयासों का उद्देश्य स्थानीय संसाधनों का संरक्षण करते हुए उनसे जुड़े समुदायों को भी लाभ पहुंचाना है, ताकि पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक विकास साथ-साथ आगे बढ़ सकें।

जल सुरक्षा और सतत विकास के लिए सामुदायिक भागीदारी जरूरी

हिमालयी क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक आपदाओं और पर्यावरणीय बदलावों के बीच जलस्रोतों का संरक्षण लगातार महत्वपूर्ण होता जा रहा है। ऐसे में 14 हजार से अधिक प्राकृतिक जलस्रोतों की मैपिंग भविष्य की संरक्षण योजनाओं के लिए उपयोगी आधार बन सकती है। हालांकि, जलस्रोतों की पहचान और सूचीकरण के साथ उनका नियमित आकलन, संरक्षण, पुनर्जीवन और स्थानीय समुदायों की भागीदारी भी जरूरी होगी। बैठक में इस बात पर जोर दिया गया कि वैज्ञानिक अनुसंधान, प्रभावी नीतियों और जनभागीदारी के समन्वय से ही हिमालयी पर्यावरण की सुरक्षा और सतत विकास के लक्ष्यों को आगे बढ़ाया जा सकता है।

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